परिवार की खुशी – एक दिल छू लेने वाली कहानी

कांच का गुलदस्ता: एक अनमोल सीख


रवि एक बहुत बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी में मैनेजर था। पैसा, शोहरत और बड़ा घर—उसके पास सब कुछ था, लेकिन एक चीज़ की कमी थी: घर की शांति और खुशी।

रवि अक्सर थका-हारा घर आता और छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ाने लगता। कभी खाने में नमक कम होता, तो कभी बच्चों का शोर उसे परेशान कर देता। उसका पूरा परिवार—उसकी पत्नी सीमा और दो बच्चे—हमेशा डर के साये में रहते कि कहीं रवि नाराज़ न हो जाए।

एक दिन, रवि की माँ ने उसे एक बहुत ही खूबसूरत कांच का गुलदस्ता तोहफे में दिया। रवि ने उसे अपने ड्राइंग रूम के बीचों-बीच रखा। वो गुलदस्ता इतना नाजुक था कि रवि हमेशा बच्चों को हिदायत देता, “इसे हाथ मत लगाना, टूट गया तो हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।”

एक शाम, जब रवि अपने ऑफिस का ज़रूरी काम कर रहा था, बच्चे खेलते-खेलते लड़ने लगे। अचानक, उनका धक्का गुलदस्ते को लगा और वो फर्श पर गिरकर चकनाचूर हो गया।

कमरे में सन्नाटा छा गया। सीमा और बच्चे थर-थर कांप रहे थे। उन्हें लगा आज तो रवि का गुस्सा आसमान छू लेगा। रवि चिल्लाते हुए कमरे से बाहर आया, लेकिन जो उसने देखा, उसने उसका गुस्सा ठंडा कर दिया।

उसने देखा कि उसकी छोटी सी बेटी के हाथ से खून बह रहा था। गुलदस्ते का एक टुकड़ा उसे लग गया था। सीमा डरते-डरते बोली, “रवि, वो… गुलदस्ता टूट गया… माफ कर देना।”

रवि ने गुलदस्ते की तरफ देखा ही नहीं। उसने तुरंत अपनी बेटी को गोद में उठाया और उसकी चोट पर पट्टी करने लगा। जब बच्ची रोने लगी, तो रवि ने उसे गले से लगा लिया और कहा, “बेटा, गुलदस्ता तो कांच का था, टूट गया तो जुड़ नहीं सकता, लेकिन तुम मेरी जान हो। मेरी असली खुशी गुलदस्ते में नहीं, तुम्हारे मुस्कुराने में है।”

उस दिन रवि को एक बहुत बड़ी बात समझ आई। उसने महसूस किया कि वह अब तक “चीजों” को “लोगों” से ज़्यादा अहमियत दे रहा था।

कहानी की सीख:

सुनीता शॉ….✍️

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