कोरोना काल की कविता

जो सबक कोरोना दे दिया, किसी क़िताब में नहीं मिला

जो सबक कोरोना ने दिया वो ज़िंदगी के किसी क़िताब में नहीं मिला,

जर्जर होते गए रिश्ते ऑंसू पोछने वालो की आहट ना मिली थी कहीं।

ऑंखें दरवाज़े पर आस लगाए ताकती रही, कंधा देने वाला ना कोई दिखा,

अपनों का साथ छूटता गया, साॅंसे अकेले दम तोड़ती रही।

इंसानियत कहीं मरती दिखीं, कहीं मोक्ष देता भगवान् मिला,

अपना नहीं था पर वो, सफेद कपड़े हर किसी को पहनाता दिखा। 

श्मशान बना गली-गली, राख ना उठाने वाला अपना मिला, 

वह कौन था जो राख मटकी में भर नाम उस पर लिखता रहा।

मिट गया निशां, खाली पड़ा घर-बार, दरवाज़े पर ना कोई अपना खड़ा दिखा, 

इस सफ़र पर ना राही, ना राहगीर था, अकेला चलता भीड़ में हर अपना दिखा।

ना होश था ख़ुद का, ना ज़िक्र किसी का होता दिखा, 

हर शख्स यहाॅं खौफ़ में, मौत से जूझता दिखा।

बुझ गया चिराग कई, अंधेरा घना सामने हुआ, 

क्या कहें इस काल में, काल बन निगलता रहा।

समय का कहर

समय का कहर

हर किसी के दिल में एक आग सी जल रही है।

हर रोज कभी सुलगती कभी बुझती जा रही है।।

खौफ है दहशत है मुस्कुराने की कोशिश भी है।

अपनों के बिछड़ने की ख़बर हर रोज मिल रही है।।

कोशिश चल रही है समय को मात देने की।

हर पहल पर धड़कने सबकी तेज हो रही है।।

ख़ामोश हर शहर है बोलती हर नज़र है।

हर रोज ज़िंदगी नया दांव चल रही है।।

पता है सब

हर बात में कहना “पता है सब”

मगर क्या सच में पता है सब?

जीवन के इस झूठ को अब तक स्वीकारा ना कोई, 

अहं रोके रखा या आदतों  ने जड़ बना ली मन में, 

ऐसे अहंकार को क्या जगह मिली समाज में!

काश समझ आती तो बात कुछ और होती, 

स्वार्थ की जगह भी “पता है सब” में ना सिमट जाती, 

यही है सच! कहते-कहते मर मिटता है इंसान, 

कभी रोष में, कभी हठ में, राग बिलापता है इंसान, 

ख़ुद को भ्रम की गहराई में क्यूँ डुबोता है इंसान, 

पूछे कोई जो मुझसे क्या है इसका कोई जवाब, 

“पता नहीं” कह कर शायद मैं भी सोचू बार-बार।।

– Supriya Shaw…✍️🌺

कविता

कहानी

कविता – वह पल दोहरा लेती हूँ

कैसे ना लिखूॅं

आँखें बंद करके

वह पल दोहरा लेती हूँ,

ज़िंदगी जीने की 

वज़ह ढूंढ लेती हूँ,

हर ख़्वाब को 

हक़ीक़त बना कर 

ज़िंदगी में शामिल कर लेती हूँ,

ज़िद समझो शायद 

पर कोशिश है मेरी,

हर किरदार को निभाने का 

हुनर ढूंढ लेती हूँ,

जुगनू नहीं मैं 

जो कुछ पल की रोशनी दे 

दम तोड़ देती है,

मैं वो सितारा हूँ

जो अपनी रोशनी से 

ख़ुद जगमगाती हूँ।।

कैसे ना लिखूॅं

कैसे ना लिखूॅं मन की बातें,

जब क़लम हाथ में लेती हूॅं, 

वह ख़ुद ब ख़ुद चलती है,

मैं कुछ नहीं कहती…

जो कहती है मेरी क़लम कहती है,

कभी अर्थहीन कहती है,

कभी जज़्बातों में लिपटी रहती है,

कभी झूठ, कभी सच कहती है,

जो कहती है मेरी क़लम कहती है, 

मैं कुछ नहीं कहती…

तुमसे मिलकर

तुमसे मिलकर दिल को यह एहसास हुआ,

ज़िंदगी से ख़ूबसूरत तुमसा हमराज़ मिला।

अनकही बातों को समझे ऐसा राज़दार मिला,

प्यार से बना रिश्ते को नाम मिला।

हमारी धड़कनों पर तुम्हारा अधिकार हुआ,

दिल के तारो में प्यार का झंकार हुआ।

तुमसे मिलकर मुझे ख़ुद से प्यार हुआ, 

अटूट बंधन मन पर, तन पर तुम्हारा अधिकार हुआ।

कहानी की कहानी 

कोरोना की कहानी

कोरोना संक्रमण का डर

कविता – पिता का दायित्व

परिवार रुपी टहनियों का, भरण पोषण करते जड़ रूपी पिता, 

इनके बिना ना हरा-भरा लगता है घर संसार हमारा। 

हर दायित्व निभाते रहते, शिकन ना चेहरे पर आने देते,

हमारी खुशियों की खातिर, अपना सर्वस्व कुर्बान है करते।

प्यार, त्याग और समर्पण से बना व्यक्तित्व है इनका , 

सबके मन में पिता का दर्ज़ा भगवान् से ना कम है। 

छत्रछाया में इनके गुजरता हमारा जीवन सदा सुरक्षित, 

हाथ पकड़ कर मार्गदर्शन कर, मंज़िल तक पहुंचाते हैं पिता।

पिता एक मार्गदर्शक

*पिता* अपने आप में गंभीर और प्रतिष्ठित व्यक्तित्व उभर कर आता है,

प्यार, सम्मान और आदर से भावविभोर हृदय हो जाता है।

जिम्मेदारियों का बोझ कंधे पर और चेहरे पर मुस्कान दिखता है,

दिन-रात हो, मौसम कोई हो, परिवार की ख़ातिर काम पर जाना होता है।

सबके दुख को सुख में बदलना इनको बखूबी आता है,

अपनी दर्द सीने में दबा कर ख़ुश रहना भी आता है।

पिता की छत्रछाया में जीवन जितना बीत जाता है,

वहीं किताब बनकर पूरा जीवन मार्गदर्शक बन जाता है।।

कहानी – रात की बात

कहानी की कहानी “दृश्य”, “दृष्टि” और “दृष्टिकोण”

कहानी – कोरोना संक्रमण का डर

“रात” – चाँद और तन्हाई

रात” – चाँद और तन्हाई

मयंक आज बहुत उदास था। अदिति से आज हुआ झगड़ा उस के दिमाग़ पर बुरी तरह छाया हुआ था। उसे होश ही नहीं था कि उसने दोपहर के बाद कुछ खाया भी नहीं है। रात के बारह बजने को थे लेकिन मयंक की आँखों में नींद नहीं थी। आज पूर्णमासी की रात थी और चाँद भी आज अपेक्षाकृत बड़ा नज़र आ रहा था। मयंक ने कुछ समय पहले ही अपने पिता का इलेक्ट्रिकल का कारोबार सम्भाला था और अब वो अदिति को उतना समय नहीं दे पाता था जितना कॉलेज के समय देता था। उसे अपने व्यापार के सिलसिले में कभी चाइना कभी जापान और कभी भारत के ही विभिन्न शहरों में चक्कर लगाने पड़ते थे। वो व्यापार फैलाने में लगा था और व्यस्तता के कारण मिलना तो दूर अदिति से फ़ोन पर भी बात करना काफ़ी कम हो गया था। आज भी वो मुंबई आया हुआ था और एक मीटिंग में होने के कारण उसने अदिति का फ़ोन कई बार काट दिया था जिससे वो बहुत भड़क गयी थी। होटेल के कमरे की खिड़की पर वो अकेले खड़ा खड़ा सोच रहा था कि वो समझती क्यूँ नहीं है? थोड़ा व्यापार बढ़ा लूँ उसके बाद जब सब सेट हो जाएगा तो मिलेंगे ना हम पहले की तरह और फिर शादी के लिए घर बालों से भी बात करेंगे लेकिन वो थी कि समझने को तैयार ही नहीं थी। पिछली बार मिले थे तब भी उसे यही समझाया था लेकिन उसका बचपना जाता ही नहीं। आज तो उसने सब सम्बंध ख़त्म करने की धमकी भी दे डाली थी जिससे मयंक को भी गुस्सा आ गया था और उसने भी कुछ उल्टा सीधा बोल दिया था। 

लेकिन असल में वो अदिति से अलग बिल्कुल नहीं होना चाहता था। वो उसका बरसों पुराना प्यार थी और अब वो प्यार खोने का डर उसे खाए जा रहा था। उसने एक बार फिर अदिति को फ़ोन लगाया था लेकिन उसने गुस्से से फ़ोन काट दिया था। ये लड़कियाँ भी ना हम पुरुषों की समस्या कभी नहीं समझेंगी यही सोच सोच कर वो अकेला अपने कमरे की खिड़की पर खड़ा व्यापार को छोड़ कर सिर्फ़ अदिति के बारे में सोच रहा था। उसका मन बहुत भारी हो रहा था। काश इस समय कोई साथ होता तो वो उससे बात कर के अपना मन हल्का कर लेता।

तभी उसकी नज़र चाँद पर जा कर टिक गयी। उसे लगा जैसे चाँद उसके अकेलेपन और उसकी उधेड़बुन को समझ रहा है और उसे एक व्यंग्यात्मक मुस्कान दे रहा है।

मयंक ने अपनी भवें हिलाई जैसे पूछ रहा हो क्या भाई, काहे मुस्कुरा रहे हो, हमें देख कर बहुत मज़ा आ रहा है क्या तुम्हें हमारी परिस्थिति पर? उसे लगा जैसे चाँद ज़ोर से हँसा। भाई मत कहो मुझे उसे चाँद से आवाज़ आयी। या तो छोटे बच्चे की तरह मामा बोल कर ताली बजाओ या फिर पके हुए मायूस आशिक़ की तरह मुझे देख कर महबूबा की याद में ठंडी आहें भरो। भाई वाला हमारा तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं है। 

मुझे अगर आहें ही भरनी है तो मैं तुम्हें देख कर ही क्यूँ भरूँ, ऐसा क्या ख़ास है तुम मे? मयंक बोला…….

मुझमें क्या ख़ास है ये मुझे नहीं पता। लेकिन दुनिया भर के दुखी या सूखी आशिक़, अपने साजन का इंतज़ार करती प्रेमिका और फिर से मिलने की आस में बैठे बिछड़े हुए दिल मुझे ही ताकते रहते हैं। चाँद ने खुलासा किया…….

मतलब तुम्हारे हिसाब से में भी किसी उम्मीद से ही तुम्हारी तरफ़ देख रहा हूँ? मयंक ने सवाल किया। 

चाँद फिर ज़ोर से हँसा। वो तो तुम जानो और तुम्हारा दिल लेकिन तुम चाहो तो मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ…. कैसे.. कैसे ? मयंक ने उत्सुकता और अधीरता से पूछा, 

मैं तुम्हें ये देख कर बता सकता हूँ की अदिति क्या कर रही है। चाँद मुस्कुरा कर बोला …….sssss सच्ची?

तो बताओ ना जल्दी से, उसमें पूछ क्या रहे हो? जब मेरे मन की बात जानते हो तो मदद करो मैं भी हर आशिक़ की तरह तुम्हें अपना गुरु मान लूँगा। मयंक विस्मय और अधीरता के मिश्रित स्वर में बोला……. 

रुको बताता हूँ कह कर चाँद दो पल रुका और फिर बोला। वो करवटें बदल रही है। उसे भी तुम्हारी तरह नींद नहीं आ रही है। कभी फ़ोन उठाती है कभी वापस रखती है। और कभी खिड़की से मेरी तरफ़ देखती है। लगता है उसे भी मेरी मदद की ज़रूरत है। ….. 

सच कह रहे हो? क्या वो अब भी मेरे लिए परेशान है, दोपहर में तो वो रिश्ता तोड़ कर चली गयी थी, मेरा फ़ोन भी नहीं उठाया। तो अब क्यूँ परेशान है ?……मयंक बड़बड़ाया।…. 

अरे यार इतना भी नहीं समझते, दिल तो उसके भी पास है। इतने दिन तेरे साथ रही, अहसास ऐसे ही थोड़ी मर जाते हैं। चाँद ने समझाया …….

इतनी परेशानी है तो फ़ोन कर लेती, मैंने थोड़ी मना किया था । मयंक रिसाए से स्वर बोला ……

तुम समझदार हो कर ऐसी बात मत करो। चाँद गुर्रया । उसका मन भी उथल-पुथल हो रहा है, वो थोड़ा डर रही है कि तुम कैसे प्रतिक्रिया दोगे। ऊपर से हर प्रेमिका चाहती है कि उसका प्रेमी उसे मनाए ।

ऐसे प्रतिक्रिया दोगे, ऊपर से हर प्रेमिका चाहती है कि उसका प्रेमी उसे मनाए इतनी जल्दी हार मानने से थोड़ी चलेगा, फ़ोन लगाओ उसे……. 

नहीं उठाया तो ?…….. मैं कह रहा ना फ़ोन लगाओ वो तुम्हारे फ़ोन का ही इंतज़ार कर रही है।……..

नहीं उठाया तो देख लेना। कह कर मयंक ने अपना फ़ोन उठाया और अदिति का नम्बर दबा दिया। एक घंटी बजने से पहले ही अदिति ने फ़ोन उठा लिया। 

कुछ क्षण दोनों तरफ़ खामोशी छाई रही फिर मयंक बोला। हेलो अदिति ….सुनते ही अदिति फूट फूट कर रोने लगी। इसके अंदर का सारा गुबार उसके आँसुओं के ज़रिए बाहर आ चुका था और अब उसके दिल में सिर्फ़ प्यार रह गया था। कई देर तक गिले शिकवे दूर होते रहे। थोड़े आँसू, थोड़ा प्यार, थोड़ी झिड़की, थोड़ा दुलार करते करते वो दोनों फिर से एक दूसरे में समा चुके थे।

मयंक बहुत खुश था। जल्दी मिलने का वादा कर उसने फ़ोन रखा और भाग कर खिड़की की तरफ़ गया और बोला। मान गए तुम्हें गुरू तुमने मेरा प्यार बचा लिया, इसलिए आज से तुम ना मेरे मामा, ना मेरे महबूब बल्कि सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे लव गुरू हो। 

लेकिन चाँद तब तक बादलों के पीछे छुप चुका था। चाँद उसके अंतस में बैठ कर उसको रास्ता दिखा कर जा चुका था शायद किसी और प्रेमी को रास्ता दिखाने।

रात गुज़र रही थी लेकिन अब मयंक तनहा नहीं था। प्यार का अहसास और पुनः मिलन की आस उसके साथ थी।

निर्मल…✍️

कहानी – कोरोना संक्रमण का डर

कहानी – हमसफ़र जूता

कहानी की कहानी “दृश्य”, “दृष्टि” और “दृष्टिकोण”

कहानी एक दृष्टिकोण

कोई भी कहानी मुख्यतः तीन चीज़ों पर निर्भर करती है। “दृश्य”, “दृष्टि” और “दृष्टिकोण” किसी दृश्य पर हमारी दृष्टि पड़ती है फिर उसे अपने दृष्टिकोण से हम कहानी का रूप देते हैं। दृश्य एक ही होता है लेकिन उस पर पड़ने वाली दृष्टि और फिर हर दृष्टि का दृष्टिकोण अलग अलग हो सकता है। 

उदाहरण के तौर पर एक दृश्य है की जंगल में शेरनी, मादा हिरण का शिकार कर रही है। दृश्य एक ही है लेकिन उसे कई दृष्टियाँ अपने अलग अलग दृष्टिकोण से देख सकती हैं। एक कहानी हिरण की हो सकती है कि एक ज़ालिम शेरनी उस निरीह प्राणी के पीछे पड़ी है और कैसे वो उसे मार कर खा गयी या हिरण ने उसे कैसे छका कर अपने प्राण बचाए, एक कहानी शेरनी की हो सकती है कि उसे कई दिन से शिकार नहीं मिला, वो भूखी है और अगर ये हिरण उसकी पकड़ में नहीं आया तो उसके और उसके बच्चों के प्राण संकट में पड़ जाएँगे। 

एक कहानी हिरण और शेरनी के बच्चों की हो सकती है जिन्हें दुनियादारी कोई मतलब नहीं वे तो सिर्फ़ अपनी अपनी माता का इंतज़ार कर रहे हैं। एक कहानी उस आदमी की भी हो सकती है जिसे हिरण मरे या शेर इस से कोई मतलब नहीं, उसे तो बस एक अच्छी सी कहानी मिलनी चाहिए। एक ही दृश्य के कई दृष्टिकोण कहानी के लिए दृश्य यथार्थ भी को सकता है और काल्पनिक भी एक दृश्य वो होता है जो हमारे सामने घटित हुआ हो या फिर वो दृश्य जो हम अपनी कल्पनाओं को उड़ान दे कर बनाएँ। इसके अलावा एक दृश्य वो भी होता है जो हमने ख़ुद तो ना जिया हो लेकिन किसी और के द्वारा हमें बताया गया हो । कहने का तात्पर्य ये कि किसी भी दृश्य को कहानी बनाने के लिए दृष्टि तीखी और अलग दृष्टिकोण हो तो कहानी सुंदर और सुघड़ बनती है।

ऐसे ही एक बार हम एक कहानी लिख रहे थे, एक देशभक्त बाप और उसके देशद्रोही बेटे की कहानी काफ़ी बढ़िया बन पड़ी थी लेकिन उसका अंत कैसे करें ये हमें बिल्कुल समझ नहीं आ रहा था। जैसे किसी हवाई सफ़र में विमान का takeoff तथा landing सबसे महत्वपूर्ण होते हैं वैसे ही किसी भी कहानी की शुरुआत और उस कहानी का अंत ही उस कहानी का भविष्य तय करते हैं। हर सफ़र में थोड़े पड़ाव और थोड़े मोड़ बहुत ज़रूरी होते हैं अन्यथा सफ़र बहुत उबाऊ हो जाता है ऐसे ही कहानी के सफ़र में भी थोड़े मोड़ आने अति आवश्यक है कहानी की रोचकता बनाए रखने के लिए।

अब हमारी कहानी में कौन जीते ये हमें बिल्कुल समझ नहीं आ रहा था। देशभक्त बाप जो सही है लेकिन अपनी ज़िंदगी जी चुका है या देशद्रोही बेटा जो ग़लत है लेकिन उसने ज़िंदगी में कुछ नहीं देखा । यहाँ आ कर हक़ीक़त और कहानी में थोड़ा फ़र्क़ आ जाता है। सीधी सीधी कहानी जिसमें बाप अपने देशद्रोही बेटे को मार देता है या पुलिस में पकड़वा देता है अथवा पुत्र मोह में बाप भी देशद्रोही हो जाता है, हमें जम नहीं रहा था.

हम निराश हो गए और कहानी को वहीं छोड़ दिया। वो कहानी अब अच्छी नहीं लग रही थी। कहानी जब लेखक को ही अच्छी ना लगे तो वो पाठकों से अच्छी लगने की उम्मीद कैसे कर सकता है इसलिए हमने उस कहानी को वहीं छोड़ दिया। कहानी बिगड़ चुकी थी ।

एक दिन हमारे घर हमारे एक मित्र अपने परिवार के साथ खाने पर आए। वे बहुत अच्छे लेखक थे और फ़िल्मों में गाने, संवाद इत्यादि लिखा करते थे। उनकी एक किताब भी छप चुकी है। परिवार में वे, उनकी पत्नी और उनका एक किशोर उम्र का लड़का था। बातें होने लगीं, मित्र सुलभ हँसी मज़ाक़ चलने लगा। तभी हमने अपने मित्र के लड़के से पूछा? क्यूँ ईशान क्या कर रहे हो आज कल, भविष्य का कुछ सोचा है? उसके बोलने से पहले ही हमारे मित्र बोल पड़े।……लेखक का बेटा, लेखक ही बनेगा कोई व्यापारी थोड़ी बनेगा। फिर अपनी ही बात पर ज़ोर से ठहाका लगा कर उन्होंने बहुत गर्व से अपने बेटे के कंधे पर हाथ रख दिया। हालांकि बात उन्होंने मज़ाक़ में ही कही थी लेकिन हमारे दिमाग में बिजली सी कौंध गयी, “लेखक का बेटा लेखक ही बनेगा ये ज़रूरी तो नहीं” लेकिन हमारी कहानी को ये वाक्य एक नया दृष्टिकोण दे गया था। एक देशभक्त का बेटा देशभक्त ही बनेगा ये भी ज़रूरी नहीं लेकिन कहानी में ऐसा ही तो मोड़ चाहिए था।

मित्र के जाने के बाद हम फिर उसी कहानी को लेकर बैठ गए। अब हमें अपनी कहानी को लैंड करवाने का रास्ता मिल गया था। हमने इस कहानी के देशद्रोही बेटे को एक अंडरकवर एजेंट बनाया जो आतंकवादियों को पकड़ने के लिए ही आतंकवादी बना हुआ है और कहानी पूरी हो गयी। कहानी बिगड़ते बिगड़ते बन गयी थी और बहुत अच्छी बनी थी। सबने उस कहानी की बहुत तारीफ़ की और हमने अपने दृष्टिकोण को दिशा देने के लिए मन ही मन अपने मित्र को धन्यवाद दिया।

निर्मल…✍️

उत्तराखंड की ऐपण कला

जादुई डायरी

आत्मविश्वास, दुनियादारी, प्रेम कविता

चीन के वुहान शहर से भारत पहुॅंचा कोरोना की कहानी

कोरोना वायरस

चीन के वुहान शहर से शुरू हुआ यह कोरोना वायरस 2020 में भारत में प्रवेश कर चुका था। नए संक्रमण के बारे में हर रोज एक नयी कहानी बन रही थी। हम सब डरे हुए थे क्योंकि इसकी पुष्टि अभी पूरी करनी बाकी थी कि आखिर इसका दुष्प्रभाव कितना प्रबल है मगर जितनी तेजी से यह फैल रहा था और लोग इससे संक्रमित होकर बीमार हो रहे थे और मर रहे थे यह सब देख कर सरकार ने लॉकडाउन का ऐलान किया, जिसके कारण पूरा देश ठहर सा गया था। जो जहां था वहीं जैसे रुक गया था।

मार्च से मई तक का समय लॉकडाउन में गुज़रा, इस बीच छोटी कंपनियां, छोटे-छोटे रोज़गार जो हर शहर में, सड़क के किनारे, फुटपाथ पर व्यवसाय से गुज़ारा करते थे सब ठप्प हो चुका था सब बंद हो चुका था। उनके रहने और खाने की असुविधा पैदा हो चुकी थी। वह अपने घर लौटना चाहते थे। मगर उनकी मज़बूरी यह थी कि लॉकडाउन में कोई एक शहर से दूसरे शहर गाॅंव नहीं जा सकता था जिसके कारण उनको कई दिनों तक भूखे रहकर गुजारना पड़ा था।

छोटे बड़े यातायात बंद होने से जितने रिक्शा चालक, ऑटो चालक, बस चालक थे उनको जो कि हर दिन की आमदनी पर उनका गुजारा होता था वह राशन, सब्जियों के मोहताज हो गए। जिनके पास पैसा था उनका गुजारा हो गया, मगर जिन्हें सबसे ज़्यादा परेशानी हुई वह थे छोटे व्यवसायिक और फुटपाथ पर रहने वाले लोग, वो दर-दर भटक रहे थे। क्योंकि काम के साथ जो व्यवसायी कर्मचारियों को रहने और खाने की व्यवस्था किए थे वह सब बंद कर दिए, उनको घर से बेघर होना पड़ा। इस हालत में रास्ते पर जहां-तहां सोकर कई कई रात गुजारे। 

यह किसी एक शहर या कस्बे में नहीं हुआ, ऐसा पूरे भारतवर्ष में हुआ। बहुत दुखदाई था वह मार्च 2020 से अगस्त 2020 तक का समय लोग रोते और बिलखते सड़कों पर दिखाई दे रहे थे। कुछ लोगों ने शहर से अपने गाॅंव पैदल जाना शुरू कर दिया था जिसमें कई गर्भवती महिलाएं भी थी जो पैदल 200-300 किलोमीटर तक का सफ़र तय कर रही थी। क्योंकि उन्हें अपने घर जाना था और उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था।

 जगह-जगह पर पुलिस रोककर पूछताछ कर रही थी और उनकी सहायता भी कर रही थी। शहर से गाॅंव पलायन होते लोगों से सरकार को यह डर था की कहीं यह संक्रमण गाॅंवों-कस्बों में ना पहुॅंचे। अगर उस वक्त गांव में पहुंच जाता यह संक्रमण तो परिस्थिति को संभालना बहुत मुश्किल हो जाता, क्योंकि उस वक्त इस बीमारी से लड़ने के लिए देश पूरी तरह तैयार नहीं था। इस बीमारी के बारे में पूरी जानकारी नहीं थी। इसलिए सरकार ने यह आदेश जारी किया था जो भी एक शहर से दूसरे शहर या गांव जाए उनको 14 दिन कोरेनटाइन होना पड़ेगा। जिसकी वजह से हर जगह आने वाले लोगों के लिए सरकार ने कोरेनटाइन सेंटर की व्यवस्था की थी। वहाॅं उन्हें 14 दिन तक रुकने के बाद ही वे अपने घर जा सकते थे।

कोरेनटाइन सेंटर में उन्हें काफी तकलीफों का सामना करना पड़ा, कई लोगों ने अपनी तकलीफ मीडिया के सामने बताया, जिसे सुनकर हर किसी की ऑंखों में ऑंसू आ जाते थे। ऐसी स्थिति में उन्हें 14 दिन गुजार कर ही घर भेजा जाता था। संघर्ष का वो समय लोग कभी नहीं भूलेंगे। 

कोरोना संक्रमण का डर

कहानी – कोरोना संक्रमण का डर

मन में एक डर क्यूँ समाया है हर वक्त चिंता और व्याकुलता में सुबह से रात और रात से सुबह हो रही है ना भूख ना प्यास, बस खाना इसलिए खाएं जा रहे हैं क्योंकि जिम्मेदारियों का जो सफ़र है वह बाकी है। अभी तो शुरुआत हुई है, और मरने की भी जहां फुर्सत नहीं वहाँ कोरोना नामक अजगर मुँह बाये हर निर्दोष को निगले जा रहा है बस डर उसी अजगर से अब लग रहा है।

सुबह का समय हो और फ़ोन की घंटी बजी तो एक भय सा मन में समां जाता है कहीं कोई अनहोनी घटना तो नहीं सुनने को मिलेगी। और डर हो भी तो कैसे ना हो, अब तक अनगिनत अनहोनी घटनाओं का ख़बर सुन चुकी हूॅं की मन दुःख और पीड़ा से भर चुका है। भगवान पर भरोसा है और नहीं भी है। मानसिक स्थिति डगमगा चुकी है, स्थिरता नहीं रहीं, और कैसे रहेगी, अपने शुभचिंतकों के मरने की ख़बर ने हिला कर रख दिया है। आस पड़ोस के सन्नाटे में खौफ का दृश्य साफ – साफ दिख रहा है।

सब के दरवाजे बंद, अब तो ऐसा लगता है जैसे दिन रात सब एक समान है ऑंखें तभी लगती है जब दिमाग और शरीर पूरी तरह से थका हो, नहीं तो ऑंखें ढपती भी नहीं है। इसी दिनचर्या को अपनाकर समय कट रहा है। 

इन सबके बीच बहुत हिम्मत जुटाकर हम सब टीवी पर समाचार सुनने बैठते हैं मगर देश प्रदेश की खबरें रोंगटे खड़े कर देते हैं। देश की जर्जर अवस्था का पोल हर रोज खुलता है। जैसे अपने ही देश का चीरहरण हो चुका है। जहां दवा, डॉक्टर, अस्पताल, ऑक्सीजन, वैक्सिंग और चिकित्सा सुविधाओं की कमी का शोर हर रोज सुनाई दे रही है। लोग दवाइयों के अभाव में मर रहे हैं इलाज के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। जिनके पास पैसे हैं उनको भी और जिनके पास पैसे नहीं है उनको भी बिना मौत के मौत मिल रही है। शायद ही ऐसा कोई घर अब दिखता है जहां मौत ना हुई हो।

इस अर्थव्यवस्था के साथ लोग जीने को मजबूर हैं। इन सबके बीच पिस रहे गरीब, उनकी स्थिति और भी दयनीय हो चुकी है। ना काम है उनके पास ना पैसे, और रहने के लिए टूटा फूटा मकान है जिसमें अगर बारिश आ जाएं तो उनके ऊपर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है। उनकी ज़िंदगी भगवान भरोसे ही चल रही है। अभाव में जीना उन्हें आता है मगर कोरोनावायरस ने जो तमाचा मारा है उससे वे सहम गए हैं। उन्हें पता है अगर उन्हें कोरोना हो जाए तो वहां उनका इलाज नहीं होगा, क्योंकि छोटे-छोटे शहरों में और गाॅंव में डॉक्टर और अस्पताल की कमी है।

 मई 2021 का यह समय बहुत कुछ समझा और दिखा चुका है‌। आज हर कोई ज़िंदगी से जूझ रहा है, जीने की कोशिश कर रहा है, कोरोना के शिकार लोगों की मदद कर रहा है उनके लिए दुआ कर रहा है देश इस महामारी से उभरे ये अर्ज़ कर रहा है।

आज के इस दौर में अगर किसी को कुछ हो जाता है तो कोई परिजन मदद के लिए नहीं आ सकते, छूने से फैलने वाले संक्रमण से सभी दूर रहना चाहते हैं इसलिए अपने चेहरे पर मास्क लगाकर मुंह और नाक को ढक कर कहीं भी आना जाना करते हैं इस संक्रमण ने सबको अपनों से दूर कर दिया है। घर में क़ैद होकर रहना लोगों ने स्वीकार कर लिया है। जितनी जरूरत हो उतना ही लोग घर से बाहर निकलते हैं अब हम सबको पता है कि अगर हम सतर्कता नहीं बरतते हैं तो इस वायरस से बच नहीं सकते। हर तरफ़ निराशा है फ़िर भी ख़ुद को दिलासा दे रहे हैं सब ठीक हो जाएगा। और सभी हिम्मत रख कर एकजुट होकर इस वायरस से लड़ रहे हैं।

2020 से शुरू हुआ यह वायरस मई 2021 में भी हमारे बीच चल रहा है। और स्थिति सुधरने के बजाय और बिगड़ती चली जा रही है।

हर अस्पताल कोरोना मरीज से भरा हुआ है। कोरोना की दूसरी लहर आ चुकी है और इस रूप परिवर्तन ने देश को हिला कर रख दिया है। आज हर गाॅंव-गाॅंव शहर-शहर कोरोना मरीज से भर चुका है अब ना कोई शहर बचा है और ना कोई  गाॅंव बचा है जहां कोरोना के मरीज नहीं है।

ज़िंदगी से रू-ब-रू

स्त्री विषयी कविता
किसान आंदोलन – हक की लड़ाई

कहानी – रात की बात

रात की बात

आज कल हम घर पर बिल्कुल अकेले थे। श्रीमती जी बच्चों को लेकर कुछ दिन मायके गयीं थी और हमें ये अकेलापन काटने को दौड़ रहा था लेकिन ये दिन भी निकलने ही थे।

दिन तो फिर भी निकल जाते थे लेकिन रात बहुत तकलीफ़ देती थी। घनी अंधेरी रातों में अकेलापन कभी ऊबाता था और कभी डराता था। आज रात हम अपना बोरिया बिस्तर ले कर छत पर आ गए थे। सोचा चलो आज खुले आसमान के नीचे, सितारों के बीच सोया जाए, शायद थोड़ा अच्छा महसूस हो ।

अमावस के बाद की ये पहली रात थी। चाँद का कहीं नाम-ओ-निशान नहीं था। अंधेरा बहुत घना था, वातावरण में मरघट जैसी शांति थी और ठंडी हवा के झौंके भी हमारी नींद में सहायक नहीं हो रहे थे। हमारे मुँह से निकला, रात तू इतनी डरावनी क्यूँ है? तभी ऐसा लगा जैसे कोई धीरे से हँस रहा हो और फिर एक आवाज़ आयी…. सच्चाई से डर लगता है तुम्हें? पहले तो हम एकदम चौंक से गए फिर डर और जिज्ञासा भरा स्वर हमारे मुँह से निकला…. मतलब? …. . वो हँसती हुई आवाज़ फिर बोली….मतलब ये अंधेरा, ये रात तो ज़िंदगी की सच्चाई है? इस से डर क्यूँ लगता है तुम्हें? तब तक हम थोड़ा संभल चुके थे। हमने कहा… डरने की क्या बात है लेकिन अंधेरा किसे पसंद आता है? और तुम हो कौन ? …… . 

मैं रात हूँ और तुम्हारे डर को भगाना चाहती हूँ….. उजाला कर दो डर भाग जाएगा, हमने कहा….. अंधेरे के पास उजाले का क्या काम? वो हँस कर फिर बोली। देखो तुम लोग एक चीज़ को समझने में हमेशा भूल करते हो और इसलिए ही डरते हो।… 

क्या?……यही कि अंधेरा हक़ीक़त है और उजाला मिथ्या…. वो कैसे?….. अंधेरा सर्व व्यापी है। वो सदा विद्यमान है। वो सारे ब्रह्मांड में फैला है। वो कहीं आता जाता नहीं है। वो असीमित है, अनंत है। ये तो उजाला है जिसे लाना पड़ता है। 

अंधेरे को छुपाने के लिए अग्नि की आवश्यकता होती है। उजाले के लिए किसी को जलना पड़ता है। जैसे तुम्हारी इस आकाश गंगा में उजाले के लिए सूर्य निरंतर जल रहा है । कह कर रात थोड़ा चुप हो गयी। अब हमें भी मज़ा आने लगा था। 

हमने कहा बात तो तुम्हारी सही है लेकिन फिर ये बताओ कि उजाले की सुख और अंधेरे की दुःख से तुलना क्यूँ की जाती है? 

वो इसलिए क्यूँकि मनुष्य सुविधा को ही सुख समझता है और उजाला सुख नहीं सिर्फ़ एक सुविधा है। और मनुष्य अब इन सुविधाओं का अभ्यस्त या कहो की गुलाम हो गया है। हालाँकि उजाला जीवन के लिए ज़रूरी भी है लेकिन जाने के कारण हमें अंधेरे को हेय भाव से नहीं देखना चाहिए क्यूँकि अंधेरा भी जीवन का अभिन्न अंग है।…. 

कैसे? हमने बात आगे बढ़ाने के उद्देश्य से पूछा। 

देखो जीवन के लिए जितनी आवश्यकता ऊष्मा की है उतनी ही शीतलता की भी है। दोनों का सही समन्वय ही जीवन का निर्माण करते हैं। उजाला ऊष्मा है और अंधेरा शीतलता। लेकिन समस्या ये है मनुष्य ने ख़ुद को उजाले के हिसाब से ढाल लिया है इसलिए अंधेरा उसे तकलीफ़देह लगता है जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। अगर अंधेरे में भी जीने का अभ्यास किया जाए तो मनुष्य सुख, दुःख की अनुभूति से काफ़ी हद तक दूर हो सकता है। 

अच्छा बताओ कुछ जीव तो अंधेरे में रहने के ही आदी होते हैं। गहरे पानी में भी जलचर बिना उजाले के रहते हैं उन्हें  कोई परेशानी नहीं होती, क्यूँकि उन्होंने इसका अभ्यास किया है। 

मनुष्य को भी दुःख और डर से छुटकारा पाना है तो अंधेरे में रहने का अभ्यास करना होगा। 

भीबात अब धीरे धीरे हमारी समझ में आ रही थी। हमने कहा तुम सही कहती हो रात। हमने उजाले को इतना अधिक महत्व दे दिया है कि अब अंधेरे को बर्दाश्त ही नहीं कर पाते। हमें इस काले सफ़ेद के भेद को ख़त्म करना होगा। अंधेरा उजाला तो एक दूसरे में समाए हुए हैं, एक दूसरे के पूरक हैं। हम काले कोयले को जलाते हैं तो वो सफ़ेद हो जाता है और सफ़ेद काग़ज़ को जलाते हैं तो काला हो जाता है। हम कोशिश करेंगे की अंधेरे को उजाले की तरह की अपनाएँ। 

धन्यवाद रात हम तो आँखें बंद करने की कोशिश कर रहे थे लेकिन तुमने तो हमारी आँखें ही खोल दीं। 

रात फिर हँसी…..हाँ एक बात और जीवन का सबसे बड़ा अंधेरा वही है जब कोई साथ ना हो। अकेलापन ही अंधेरा है। जब कोई साथ होता है तो ना अंधेरा महसूस होता है ना डर। जैसे सूर्य अथवा चाँद के होने से अंधेरा मिट जाता है वैसे ही तुम्हारे साथ तुम्हारे परिजन होने से तुम्हारे मन का अंधकार मिट जाता है। इसलिए या तो अकेले रहने की आदत डाल लो या अपने परिजनों के बीच रहो। कह कर रात फिर एक बार हँस कर शांत हो गयी। 

हमारा मन भी अब एक अलौकिक सी शांति महसूस कर रहा था। हमारी पलकें अब भारी हो रही थी कि तभी बारिश की एक बूँद हमारे चेहरे से टकराई और हम अपना बोरिया बिस्तर समेट कर नीचे की तरफ़ भाग लिए । शायद आज नींद नसीब में ही नहीं थी।

निर्मल…✍️

बचपन

कुछ लोग मिले थे राहों में

बनावटी रिश्तों की सच्चाई

कहानी – हमसफ़र जूता

दोपहर का समय था और मै बहुत थका हुआ था, मेरे पाँव दर्द से बिलबिला रहे थे। इतना बिलबिला रहे थे की मैंने उन्हें सिकाई के लिए नमक वाले गर्म पानी में डाला हुआ था। घर का मुख्य दरवाजा खुला हुआ था। और तभी मेरी नज़र दरवाज़े के बाहर से झांकते हुए मेरे गंदे, मैले-कुचले जूते पर पड़ी। मुझे पता नहीं क्या सूझा मैंने गर्म पानी के टब में से अपने पैर बाहर निकाले और बाहर जा कर उन जूतों को उठाया। वो जूते मैंने बाथरूम में ले जा कर सर्फ़ और साबुन से तब तक धोए जब तो उनसे धूल-मिट्टी का एक एक कण नहीं निकल गया। वो मेरे पसंदीदा स्पोर्ट्स शूज़ थे। मैंने उन्हें बड़ी इज्जत से पंखे के नीचे सूखने के लिए रख दिया फिर वापस अपने पाँव टब में डाल दिए । एक प्यार भरी नज़र मैंने जूतों पर डाली और कल शाम से ले कर अभी तक के घटनाक्रम के बारे में सोचने लगा।

मुंबई में कल बहुत भयंकर बारिश हुई थी। शायद मुंबई के इतिहास की एक दिन में हुई सबसे अधिक बारिश। शाम होते होते मुंबई की लाइफ़ लाइन यानी के लोकल ट्रेन पटरियों पर पानी भरने की वजह से बंद हो चुकी थीं। सड़कों पर भी पानी भर गया था इसलिए यातायात भी अधिकतर जगहों पर ठप सा हो गया था। मेरा ऑफ़िस हमारे घर से क़रीब चालीस किलोमीटर दूर था जहां मैं लोकल ट्रेन द्वारा ही आता जाता था। शाम को जब घर जाने का समय आया तो हमें पता नहीं था कि हम घर कैसे पहुँचेंगे। यूँ तो क़रीब पचास लोग थे हमारे •ऑफ़िस में लेकिन कोई आस पास ही रहने वाला था और कोई कहीं और रहने वाला था सो मैं और मेरे दो सहकर्मियों जो मेरे घर के आस पास ही रहते थे, ने फ़ैसला किया कि हम तीनों साथ में चलते हैं और रास्ते में जो भी साधन मिलेंगे हम धीरे धीरे कर के घर पहुँच जाएँगे। स्तिथि ख़राब है हमें मालूम था लेकिन इतनी ज़्यादा ख़राब है ये हम में से किसी को भी अंदाज़ा नहीं था।

हम तीनों ने पैदल चलना शुरू किया। जेब के सामान के अलावा सिर्फ़ हमारा मोबाइल, बदन के कपड़े और जूते ही हमारे साथ थे। पैदल चलते चलते हम लोग लगभग दस किलोमीटर आगे निकल आए लेकिन आगे जाने के लिए कोई साधन नहीं मिला। पैदल चलते चलते हालत ख़राब होने लगी थी। भूख भी लगी थी। रास्ते में बहुत से लोग अपनी अपनी क्षमता अनुसार परेशान लोगों को चाय बिस्कुट इत्यादि बाँट रहे थे क्यूँकि हमारे जैसे हज़ारों लोग पैदल ही अपनी मंज़िल की तरफ निकल पड़े थे और सभी परेशान थे। 

तभी हमारे एक साथी का धैर्य जवाब दे गया। उसने कहा अब और नहीं चलूँगा मैं वापस जाने के लिए कुछ बसें चल रही है मैं तो वापस जा रहा हूँ, ऑफ़िस में ही रुक जाऊँगा। समस्या आगे चल कर अधिक थी इसलिए आगे जाने वाली गाड़ियाँ सड़क पर रुकीं हुई थी लेकिन वापस शहर की तरफ़ आने के लिए धीमे धीमे चल रही थीं। हमने उसे मनाया लेकिन वो नहीं माना और वापस जाती एक बस में चढ़ गया। 

अब हम दो लोग बचे लेकिन हमने आगे बढ़ना जारी रखा। मोबाइल की बैटरी ख़त्म ही चुकी थी सो उसने भी साथ छोड़ दिया। क्यूँकि हम दोनों साथियों ने ही स्पोर्ट्स शू पहने थे इसलिए चलने में थोड़ी आसानी थी। रास्तों में कहीं पानी भरा था कहीं कुछ जानवरों की लाशें पढ़ी थीं तो कहीं रुकी गाड़ियों की वजह से रास्ता बंद था। तो हमें कभी पानी में डूब कर कभी यहाँ वहाँ चढ़ कर और कभी छलांग लगा लगा कर आगे बढ़ना पड़ रहा था। 

कितने भी अच्छे जूते हों लेकिन बीस किलोमीटर चल कर वो भी ऐसी परिस्थिति में, कोई भी थक जाएगा। हम एकदम निढाल ही चुके थे। अब तो रास्ते पर पानी इतना अधिक था की सड़क भी नहीं दिख रही थी। तभी हमने देखा कि पानी के बीच एक बस खड़ी है जिसमें कुछ ही लोग दिख रहे थे। रात के क़रीब ग्यारह बज चुके थे और हम दोनों की हिम्मत जवाब दे चुकी थी। हम दोनों उस बस में चढ़ गए ख़ाली सीट देख कर हम लोगों उस पर बैठ गए। किसी बस में बैठने पर इतना सुकून तो आज तक नहीं मिला था। 

बस के अंदर भी थोड़ा पानी था लेकिन जूतों की वजह से ये अधिक परेशानी वाली बात नहीं थी, वरना तो पानी में दिए दिए पैर गल जाते। बस पानी में फँसी हुई थी सो आगे जाने वाली नहीं थी लेकिन हम आँखें मूँद कर उसी में तब तक पड़े रहे जब तक सुबह नहीं हो गयी। 

घर वाले भी चिंता कर रहे होंगे लेकिन उन्हें खबर करने का कोई साधन फ़िलहाल हमारे पास नहीं था। सुबह उठ कर थोड़ा ठीक लगा तो हम बस से उतर गए। पानी थोड़ा कम हो गया था लेकिन यातायात अभी थीं ठप था। भूख लगी थी लेकिन कोई इजाज़ नहीं था। 

तभी वहाँ साथ में चल रहे किसी आदमी ने सुझाव दिया कि सड़क मार्ग पर अधिक पानी है और रास्ता अधिक लम्बा है। रेल की पटरी पर सीधे सीधे चलेंगे तो आसानी होगी, ट्रेन तो वैसे भी चल नहीं रही हैं। मुझे सुझाव ठीक लगा और मैंने अपने सहकर्मी की तरफ़ देखा लेकिन वो अधिक आश्वस्त नहीं लग रहा था। उसने कहा यार अब बिल्कूल हिम्मत नहीं है, रेल की पटरी पर चलना आसान नहीं होता, कितने पत्थर होते हैं वहाँ, 

मैं एक काम करता इधर से दो किलोमीटर अंदर की तरफ़ मेरे रिश्तेदार का घर है मैं उधर चला जाता हूँ बाद में घर जाऊँगा जब सब थोड़ा ठीक हो जाएगा, तू निकल। थोड़ी निराशा तो हुई लेकिन मैंने उसे ok तू मेरे घर पर फ़ोन कर देना जरा, कह देना पहुँच जाऊँगा थोड़ी देर में चिंता ना करें, बोल कर रेल की पटरी की तरफ़ निकल गया।

मुंबई का भूगोल कुछ ऐसा है की पूरा मुंबई जैसे एक लाइन में बसा हुआ है। रेल की पटरी और मुख्य सड़क दोनों पूरी मुंबई में समानांतर चलते हैं। रेल की पटरी पर मैंने चलना शुरू कर दिया। बिल्कूल अकेले। मोबाइल साथ छोड़ चुका था, साथी भी अपनी अपनी राह जा चुके थे। 

कपड़े शरीर पर चुभ रहे थे लेकिन उन्हें पहने रखना मजबूरी थी। इस पूरे रस्ते अगर कोई मेरा पूरी मेहनत और बिना शिकायत के साथ दे रहा था तो वो थे मेरे जूते। 

अगर वो ना होते तो शायद मैं यहाँ भी नहीं पहुँचता अभी तो आधा रास्ता बाक़ी था। रेल की पटरी पर तो आप नंगे पैर चलने की सोच भी नहीं सकते। कोई छोटा, कोई मोटा, कोई नुकीला और कोई भारी पत्थर आपको घायल कर के ही छोड़ता लेकिन वो सारा दर्द, वो सारी तकलीफ़ मे जूते ने अपने ऊपर ले ली थी। दो दो- तीन तीन किलोमीटर के फाँसले पर मुंबई के उपनगरीय रेल्वे स्टेशन हैं। हमने चार स्टेशन यानी लगभग दस किलोमीटर ऐसे ही पार किए। भूख और थकान अब चरम पर पहुँच गयी थी और अभी और लगभग दस किलोमीटर का सफ़र बाक़ी था। 

स्तिथियाँ धीरे धीरे ठीक होती दिख रही थीं यानी की पानी काफ़ी हद तक उतर गया था और कुछ गाड़ियाँ सड़क पर चलती हुई दिख रहीं थी लेकिन ट्रेन अभी भी शुरू नहीं हुई थीं। दिन के लगभग ग्यारह बज गए थे और सूरज की धूप भी तीखी हो गयी थी। आज बारिश का नाम-ओ-निशान नहीं था। हमने सड़क पर जा कर कोई वाहन देखने का फ़ैसला किया जो हमें घर के पास पहुँचा सके। कुछ दूर सड़क पर चलने के बाद एक भला सा ट्रक वाला मिला जो हमारे घर तरफ़ ही जा रहा था और रास्ते में चलने वाले लोगों को पूछ पूछ कर अपने ट्रक पर चढ़ा रहा था मुझे तो जैसे किसी देवता के दर्शन गए थे। मैं भी लपक कर उस ट्रक के पीछे वाले भाग में चढ़ गया। 

बहुत गर्म हो रखा था उस ट्रक का फ़र्श। धूप बहुत तेज थी आख़िर और कोई छत भी नहीं थी ट्रक की। लेकिन मेरे उस दर्द को भी मेरे जूते ने झेल लिया। बैठ तो नहीं सकते थे उस गर्म पतरे पर लेकिन अपने जूते के भरोसे खड़े तो हो ही सकते थे। क़रीब एक घंटा खड़ा रहने के बाद जो की तीन चार घंटा चलने के मुक़ाबले तो बहुत बढ़िया था।

मैं अपने घर के एकदम पास पहुँच गया। ट्रक वाले को धन्यवाद बोल कर उसे पैसे भी देने की कोशिश की जो उसने नहीं लिए और मैं अपने पूरी तरह निढाल शरीर और एक मैले कुचैले लेकिन वफ़ादार जूतों के साथ घर पहुँच गया।

निर्मल…✍️

कविता

नए भारत का निर्माण

सिल्की व शाइनी हेयर

आपके हौसले, इरादे, आत्मविश्वास, दुनियादारी, प्रेम और समर्पण पर कविता

आपके सपने और आत्मविश्वास

लेखक के क़लम द्वारा पाठकगण से एक गुज़ारिश

नज़र

दुनिया आपको किस नज़र से देखती है, 

या फिर

आप दुनिया को किस नज़र से देखते हैं, 

ये बात बिल्कुल भी मायने नहीं करता,

फर्क सिर्फ इस बात से पड़ता है,

कि आप स्वयं को किस नज़र से देखते हैं। 

जब तक आप अपनी नज़र में हैं,

तब तक दुनिया की कोई भी ताकत,

आपके इरादों को, हौसलों को, 

आपके सपनों को, आपके आत्मविश्वास को,

चाहकर भी नहीं तोड़ सकती, 

चाहे वो कितनी भी कोशिश कर लें। 

लेकिन वही जब आप पूर्णतः

अपनी ही नजरों से ही गिर जाएंगे ना,

तब आपके जीवन रुपी नौका को, 

मझधार में डूबने से कोई नहीं बचा सकता, 

आपको डूबने से बचाने की, 

चाहे कोई कितनी भी कोशिश कर लें।

(इसलिए आप – हम सब हमेशा ही अपने नजरों में रहें । ऐसा करने पर ही हम, आप सब संघर्ष रुपी इस जीवन में सदैव अपनी – अपनी विजय – पताका लहरा पाएंगे, हर मुसीबतों, हर बाधाओं के ऊपर और लिखेंगे अपनी कामयाबी की दास्ताँ जिसकी आवाज सदियों सदियों तक रह पायेंगी इस नश्वर संसार में।)

यादों के खंडहर

यादों के खंडहर में कैद हैं, 

जीवन के अनगिनत लम्हें,

जो लौटकर आते नहीं कभी।।

हाँ, वो जो अनगिनत लम्हें हैं ना,

वो कुछ खुशी के तो कुछ गम के हैं,

हाँ, वो ही बन गये हैं अतीत ।। 

आ जाते हैं उभरकर कभी – कभी,

आंखों की गहराइयों में,

वो लम्हें हकीकत नहीं, प्रतिच्छाया बनकर।। 

होता है जब कभी ये चंचल मन स्थिर कभी,

तन्हाई और अकेलेपन में खुद को पाकर,

हंस देता है कभी-कभी, रो देता है कभी-कभी।। 

और निभाती है तब साथ उस चंचल मन का,

बस सिर्फ आंखें, दिल, और ओंठ ही।।

प्राप्त कर लेती है अमरत्व को 

प्राप्त कर लेती है अमरत्व को,

कुछ प्रेम कहानियाँ,

कर देती है स्वयं को समर्पित, 

जो समस्त संसार की खुशियों में, 

अपनी निजी खुशियों का दामन त्याग कर, 

और बन जाती है उदाहरण,

समस्त प्रेम कहानियों के लिए,

सदियों तक इस नश्वर संसार में।

होती है बेहद ख़ूबसूरत,

कुछ प्रेम कहानियाँ,

जो प्राप्त कर लेती है अपनी मंज़िल. 

और बिखेर देती है चहुँ ओर खुशियाँ, 

अपनी निजी खुशियों के रंगों में रंग कर, 

और बन जाती है उदाहरण, 

समस्त प्रेम कहानियों के लिए, 

सदियों तक इस नश्वर संसार में।

लेखिका: आरती कुमारी अट्ठघरा ( मून)

नालंदा, बिहार

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