नारी का अस्तित्व

नारी का अस्तित्व

बहुत लम्बा अरसा हो गया हमें साथ में रहते हुए, 

जिंदगी के खूबसूरत लम्हों को मिलकर संजोते हुए,

पर फिर भी तुम मुझे कभी समझ ही ना सके।

खुशी हुई मुझे हर दर्द को तुम्हारे अपना बनाते हुए, 

सब कुछ छोड़कर अपना आई थी मैं सिर्फ तुम्हारे लिए, 

पर फिर भी मुझे तुम कभी दिल से अपना ही ना सके।

मलाल नहीं मुझे कि तुम इस विपदा में छोड़कर गए, 

फेरों के उन सात वचनों से मुख मोड़कर गए, 

पर फिर भी मेरी उम्मीदों को तुम तोड़ ना सके।

आज मैं दुखी हूँ अपने ही दर्द में मशगूल रहते हुए, 

रोज जलती हूँ तुम्हारी कड़वी बातों को सुनते हुए, 

पर फिर भी मेरी ख़ामोशी को तुम समझ ना सके।

ज़िंदगी कट रही है बस तुम्हारे साथ होकर भी न साथ रहते हुए, 

जीवन बीत गया सम्पूर्ण मेरा तुम्हारे संसार को संभालते हुए, 

पर फिर भी तुम मुझे कभी प्रेम से संभाल ही ना सके।

शीर्षक – नकारते है हम रिश्तों को जितना

नकारते है हम रिश्तों को जितना,

वो उतना ही हमारे करीब आ जाते हैं।

प्रेम जिंदा रहता है दिल में हर पल, 

बस वक़्त की शूली पर हम चढ़ जाते हैं। 

आख़िर मनुष्य है न भ्रम के वशीभूत हो अकसर, 

नाते-रिश्ते तोड़ने की कोशिश कर जाते हैं। 

ये रिश्ते होते है भगवान का दिया  सुंदर उपहार, 

इनसे हम ज़्यादा देर मुख नहीं मोड़ पाते हैं। 

जीवन है दुःख-दर्द, हँसी-खुशियों से बना

दवा का ख़ज़ाना, अपने ही कहलाते हैं। 

हाथ से पल भर का साथ क्या छूटे, 

थोड़ा-सा नाराज़ ज़रूर हो जाते हैं। 

सीने में भरकर उनके लिए गुस्सा, 

आँखों में आँसू छिपाते रह जाते हैं। 

प्रेम मैं वो तपिश है दुनिया की, 

जिसके समक्ष पत्थर भी पिघल जाते हैं। 

हम तो ठहरे इंसान भावनाओं से बने, 

भावों के आगे ख़ुद निढाल पड़ जाते हैं।

 शीर्षक – पत्नी

बड़ी नफ़ासत से सब कुछ, मेरे नाम का उसने अपना रखा है। 

मेरी पत्नी है वो जिसने अपने नाम का, एक सपना भी नहीं रखा है।

मैं तो बस अपनी नौकरी में मशगूल रहता हूँ, 

मेरी पत्नी ने अपनी नौकरी के साथ, मेरा घर सम्भाल रखा है। 

मेरी गलतियों को उसने हमेशा छुपाकर रखा है,

अपने अहम में चूर मैं उसे बोलने का अवसर नहीं देता हूँ।

मैंने सदा के लिए उसे केवल स्वार्थवश, अपनी आदत में शामिल कर रखा है।

मेरी पत्नी है वो जिसने मुझको जीताकर मेरे स्वाभिमान को ज़िंदा रखा है,

मैं तो सदा ही उसे बस, श्रृंगार की तुला पर तौलता आया हूँ,

मेरी पत्नी है वो जिसने, मेरे लिए अपना सर्वस्व लुटा रखा है। 

मैं तो उसकी छोटी-छोटी गलती को, बढ़ा-चढ़ाकर दिखाता हूँ, 

लेकिन मेरी पत्नी है वो जिसने, मुझे, पूर्ण श्रद्वाभाव से अपना ख़ुदा मान रखा है।

लेखिका:  प्रिया कुमारी 

फरीदाबाद

कविता – हिंदी दिवस

Usha Patel

लिपि है इसकी देवनागरी,

भोली भाली है इसकी बोली,

नाम है इसका हिंदी… 

हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता,

हमारी शान है हिंदी,

हमारा देश का गौरव,

हमारा स्वाभिमान है हिंदी,

हमारी पहचान है हिंदी,

एकता की जान है हिंदी,

हमारी राष्ट्र-भाषा है हिंदी,

अलग-अलग प्रांतों में बोली हिंदी,

हिंदी तुझमें माँ जैसा भाव है,

सुंदर लेखन में लगती प्यारी हो,

हिंदी की धारा में माँ गंगा जैसा बहाव है,

तेरे लेखन में अद्भुत रिझाव है,

ये कैसा लगाव है,

बरगद की छांव है हिंदी,

भाषा है ये कुछ लोगों के लिए,

कइयों के साॅंस में बसती है हिंदी,

कबीरदास, तुलसीदास के

अलग अलग बोली में हिंदी,

भारत माँ के ललाट पर सजती हिंदी की बिंदी,

सारी भाषा है प्यारी पर हिंदी है निराली,

हिंदी से ही हिंदुस्तान यही हमारा है अभिमान,

सारे विश्व में फैले यही हमारा है अरमान..! 

संघर्ष कर

बड़े बड़े तूफ़ान थम जाते है,

जब आग लगी हो सीने में,

संघर्ष से ही राह निकलती है,

मेहनत से ही तक़दीर बनती है,

मुश्किलें तो आती रहेगी,

कोशिश करने से ही मुश्किलें संभलती है,

हौसले ज़िंदा रख तो मुश्किलें भी शर्मिंदा हैं,

मिलेगी मंजिल रास्ता ख़ुद बनाना है,

बढ़ते रहो मंज़िल की ओर चलना भी ज़रूरी है,

मंज़िल को पाने के लिए,

एक जुनून सा दिल में जगाओ तुम,

तू संघर्ष कर छू ले आसमान,

जीत ले सारा जहान….! 

संकट के बादल छंट जाएंगे

तेरे संकट के बादल सब छंट जाएंगे,

मन के तिमिर तेरे सब हट जाएंगे,

तुमको दिनकर देगा फिर से प्रकाश,

बस तुम करते रहना ख़ुद से प्रयास,

तुम विचलित अपना मत धैर्य करो,

बस मन के केवल तुम अवसाद हरो,

तुम निष्काम कर्म सदा करते रहना,

फल की चिंता में किन्चित मत रहना,

फिर तेरे प्रयास स्वयं ही मिल जाएंगे,

मन में ज्योतिपुंज सब खिल जाएंगे। 

लेखिका : उषा पटेल

छत्तीसगढ़, दुर्ग

किसान आंदोलन – हक की लड़ाई

kisan andolan

गाजीपुर बॉर्डर की सच्चाई जान कर भी अंजान बने उन लोगों के आज पसीने छूट रहें हैं किसान संगठन की रूपरेखा इतनी मजबूत साबित होगी यह सोच विपक्षी जन उन्हें आतंकी साबित कर रहें हैं। क्या इनके मंसूबे पूरे होंगे? क्या किसान आंदोलन टूट जाएगा?

100% उनके हौसले और बुलंद है आखिर 26 जनवरी की घटना के बाद जो यह आंदोलन टूट जाना चाहिए था जिस अपराध को अंजाम दिया गया और मोहरा मासूम किसान बने। क्या यह सही था,  क्या देश की जनता नासमझ है। अपराधी का सर हमेशा नीचे झुका मिलता है, मगर आज किसान आंदोलन की लहर जितनी गर्मजोशी के साथ आगे बढ़ा रही है,  क्या लगता है यह मासूम किसान अपराधी, आतंकी है!

किसान जिस हक की लड़ाई लड़ने के लिए अपना घर परिवार छोड़ सरकार का दरवाज़ा खटखटा रहें हैं क्या यह गलत है? आज देश का हर नागरिक उनके साथ खड़ा है, और जो नहीं खड़े हैं वह नज़रें झुका कर उनको गलत बोलने को मजबूर है। आखिर क्यों है? किस का दबाव है उन पर, क्यों कुछ लोग उनका खुलकर समर्थन नहीं कर पा रहें हैं?  कहीं ना कहीं उन्हें दबाया जा रहा है उनकी आवाज़ को दबाया जा रहा है। 

आज वहाॅं पानी, बिजली,  इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई है।  चारों तरफ से पुलिस तैनात है क्या होने वाला है किसानों के साथ।  26 जनवरी को भी लाल किला के पास पुलिस थी मगर जो हुआ क्या यह माना जा सकता है। इसके लिए ज़िम्मेदार केवल किसान है या किसी की साजिश के शिकार बने  किसान। 26 जनवरी की ट्रैक्टर रैली में ऐसी ख़लल कोई सोच नहीं सकता है फिर यह कैसे हुआ या होने दिया गया?  सवाल है जवाब है, मगर सभी चुप है।  और आज किसान के साथ पूरा देश है और जो नहीं है उनके साथ, क्या हम यह नहीं माने, उनके साथ जो हुआ उसके जिम्मेदार वही लोग विपक्षी दल है।

“ज़ज़्बा बेमिसाल है टूटेगा नहीं,

आंदोलन का रुख़ बदलेगा रुकेगा नहीं, 

तोड़ने वाले क़दम बढ़ा रहें हैं, 

किसानों के हौसले पर क़दम उनके रुक रहें हैं।।”

सिंधु बॉर्डर और टिकरी बॉर्डर पर किसान आंदोलन के सामने जो पथराव, हिंसा को बढ़ाया गया क्या हम यह नहीं समझ सकते, यह किसानों के हौसले को तोड़ने की दूसरी साजिश है। लेकिन क्या इन सब से किसानों का मनोबल टूटेगा, कभी नहीं, आंदोलन की लहर तेज़ हो रही है और किसानों का इंसाफ, पूरा देश का इंसाफ है। आज पूरा देश उनके साथ है।

 सवाल और जवाब के बीच “आवाज” पावर और सत्ता के सामने कुछ लोगों की दवा दी गई है, मगर कब तक। अनगिनत किसानों में उनकी गिनती भी शामिल हो जाएगी, जो आज बोल नहीं पा रहें हैं साथ नहीं दे पा रहें हैं किसानों का।

“जहाॅं मंसूबे समाज के हित में हो, 

वहाॅं अनगिनत आवाज़ जुड़ते हैं”

– Supriya Shaw…✍️🌺

नारी

Naari

खाने में नमक ना हो तो वह स्वाद कहाँ।

लेखनी में हम ना हो तो वह जज़्बात कहाँ।।

Intazaar

हर लम्हों का हिसाब कोई ना रखता है यहाँ।

जो इंतज़ार में बदल जाएँ वो घड़ियाँ बेहिसाब यहाँ।।

Shikayate

खामोशियों में तेरी शिकायतों का लहजा,

कुछ ना कहकर भी कह देना ऐसा,

पास रहकर भी पास ना आना तेरा,

ये अनसुनी शिकायतों का पहरा कैसा।।

Khushboo

फूल सूख कर शाख़ से गिर गए,

 ख़ुशबू आज भी मौजूदगी का

 एहसास करा रही है।।

Rishte

एक अजीब-सी ऊर्जा और उत्साह होती है रिश्तों में, 

शब्दों की आत्मीयता का आभास भरपूर मिलता है।

जितने रंग होते हैं रिश्तो के, सब के रूप अनोखे मिलते हैं,

प्यार, स्नेह का अटूट बंधन, आंखों से सीधे दिल में उतरता है।।

Beparwah

बेपरवाह हो गई हूॅं ज़िंदगी

आज़ाद हूॅं अब हर रंजिश से।

सुकून की घड़ी अब मिल गई,

अल्हड़ ज़रूर थोड़ी सी हो गई।।

Yaade

ख़ामोश होकर रह जाती हूँ 

जो कुछ कहना है तुमसे, 

वो ख़ुद से कहती हूँ , 

अतीत की यादें 

धुंधला गई ज़रूर, 

मगर वजूद उसका।। 

– Supriya Shaw…✍️🌺

कविता – कद्र करना सिखा दिया, कोरोना का समय

उषा पटेल

छोटी – छोटी बातें और छोटी से छोटी वस्तुएँ समय आने पर कितने काम आती है, यह समझा दिया है। 

कद्र करना सिखा दिया…. 

महामारी से ग्रस्त यह साल

अपने आखिरी महीने तक आ पहुॅंचा है। 

गुज़रे नौ – दस महीने

किसी सख्त दिल गुरु की कक्षा जैसे, 

जो कुछ कड़वे, तो

कुछ मीठे सबक सिखा गए। 

किसने सोचा था कि

एक ऐसा दौर आएगा, 

जब हम सब घर के बाहर नहीं, 

घर के भीतर का, अपने रहन – सहन, 

आदतों का, सोच- समझ, रिश्ते – नातों, 

परवाह का अन्वेषण करेंगे, 

लगातार, महीनों तक ? 

 घर में रहना सीखेंगे। अपने घर

के खाने की कद्र करना समझेंगे। 

काली मिर्च, अदरक, लौंग जिन्हें

तीखा समझकर दरकिनारा कर

देते थे, उनको सोने – चांदी की तरह संभालेंगे। 

गर्मी में भी गुनगुना पानी पिएंगे, 

वो भी हल्दी डालकर। 

घर की स्त्रियां कितना काम

करती हैं, समझ पाएंगे। 

थककर बैठे इंसान को 

एक प्याला चाय मिले, तो

उसे कितनी राहत मिलती है, जान पाएंगे। 

जो हर समय घर में रहते रहें हैं, 

उनकी स्थिति का बहुत अच्छी

तरह अंदाजा लगा पाएंगे। 

केवल धूल साफ कर देने 

की मदद मिल जाए, 

तो कितना इत्मिनान होता है, यह जान पाएंगे। 

परिवार साथ हो, तो जीवन चाक-चौबंद रहता है,

किसी तरह का कोई डर नहीं सताता, 

किसी मुश्किल का अंदेशा परेशान नहीं करता, 

हाथ और मन कितने मजबूत हो जाते है 

यह छोटी – सी, सदियों से जानी – मानी

हकीक़त भी समझा गया यह साल।

लेखिका : उषा पटेल

छत्तीसगढ़, दुर्ग

कविता – ख़्वाबों के शहर में

ख्वाबों का शहर

मेरे ख्वाबों का शहर मिल गया है आज मुझे,

यहाॅं की हवाओं में ग़जब सी मस्ती है,

तेरे शहर की फिजाओं में ख़ुशी दिखती है,

हर जवां लबों पर फूलों सी हॅंसी दिखती है,

हर गली रौशन है चाहत के चिरागों की तरह,

यहाॅं हर मोड़ पर हर ग़म की दवा मिलती है,

मेरे ख़्वाबों के शहर में हर छत में है भरोसा कायम,

यहाॅं हर मकान में यौवन की महक दिखती है,

हर हसीन दिल में मुहब्बत की चमक दिखती है। 

घर घर नहीं रहे

तब से वो घर-घर नहीं रहें,

जब से पुराने शजर नहीं रहें,

जब साया ही न रहा दुआओं का,

अब तो एक साथ बसर भी न रहें,

हमने पुरानी बस्तियों को छोड़कर,

अपनी ख़ुशियों के घर बना लिए,

पुरानी पीढ़ियों को छोड़कर, 

नये अपने ताल्लुकात बढ़ा लिए,

जो अपनी जड़ से दूर हो गए,

फिर आज वो वृक्ष भी कहाॅं रहें,

विश्वास के स्वर कभी वहाॅं गूंजते थे सम्मिलित,

रौशनी भी प्यार की सब के दिलों में प्रज्वलित,

आज दीवारें देखो ईट की ऑंसुओ सी झर रही,

रौनके मकान की बस आखिरी साॅंस भर रही,

घर बेचारा क्या करें जब न हम रहें न तुम रहें,

अब वो घर  घर नहीं रहें,

जब से पुराने शजर नहीं रहें…। 

 शजर – (वृक्ष, दरख़्त)

तुम्हारी खुशी से बढ़कर

तुम्हारी ख़ुशी से बढ़कर माॅंगी दुआ न रब से,

हम अब भी मुस्कुराये ख्यालों में तुम्ही आये,

ये रौनक तुम्ही से मेरी, तुम खुश्बू – ए – बदन हो,

लब से जिन्हें लगाया उन फूलों में तुम्ही आये,

मुहब्बत का दोस्ताना बस सलामत रहें हमारा,

इबादत करूँ मैं जब भी मुरादों में तुम्ही आये,

तुम मेरे हमनशीं हो तुम मेरे चाँद महाजबीं हो,

हरदम मेरी क़िस्मत में सितारों से तुम्हीं आये,

तुम्हारी ख़ुशी से बढ़कर माॅंगी दुआ न रब से,

हम अब भी मुस्कुराये ख्यालों में तुम्हीं आये..! 

Usha Patel

लेखिका : उषा पटेल

छत्तीसगढ़, दुर्ग

कविता – एक मधुर मुस्कान

Usha Patel

 हॅंस दे जब छोटा सा बचपन मातृभाव जीवित होता हैं,

कोई हँसकर कह दे मैं तेरा हूँ, दुःख तेरा सीमित होता है,

रिश्तों में आ जाए मधुरता, बैठ करें जब हॅंसी ठिठोली,

कितना प्यार बरसता है हम हँसकर खेले आँख मिचौली,

कितने भंवरे जीवित होते हॅंसता जब कलियों का यौवन,

कल-कल हॅंसती जब सरितायें तरुओं में आ जाएं जीवन,

तेरी एक हॅंसी छोटी सी, कितनी बाधा कर दे आसान,

फिर बज उठती मन के वीणा में एक मधुर सी तान,

हॅंसी तुम्हारे उर अंदर की व्यक्त करें अधरों की भाषा,

ये मन्द-मन्द मुस्कान तुम्हारी दूर करें घनघोर निराशा,

होठों के सुख की मुस्की में छिपी हुई एक नयी कहानी,

कोई हँसकर नज़र झुका ले, समझो है तेरी ये प्रीत पुरानी,

अंतर्मन के भाव बदलती बस ये एक मधुर मुस्कान,

फिर बज उठती मन के वीणा में एक मधुर सी तान। 

चल पड़े हम

अब चल पड़े हम अग्निपथ पर,

जब छोड़ सुख का हर धरातल,

अब तपकर ही हम कुंदन बनेंगे,

लह लहायेगा मन का मरुस्थल,

अब इन राहों की तपती धूल में,

सब जल रहे हैं अवसाद दिल के,

मानो मुझसे गर्म झोंके कह रहें हैं,

बस कुछ दूर है ख़ुशियों के बादल,

तुझे मनो वासनाएं बहकाएंगी,

बस देखना मत तू पीछे पलट-कर,

अपने हौसलों  की ओट लेकर,

तू बढ़ता चल जा अग्निपथ पर,

माना मंज़िल से पहले तू अगर,

जलकर खाक में मिल जायेगा,

फिर आनेवाली नस्लों के ख़ातिर,

तू एक नया हौंसला बन जायेगा। 

लेखिका : उषा पटेल

छत्तीसगढ़, दुर्ग

स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त पर बाल कविता

प्रेम और समर्पण पर कविता

कविता । कोरोना महामारी में इंसान की उम्मीद ना टूटे कभी

आधुनिक गाॅंव….एक कहानी

Adhunik gaon

आज कई सालों बाद मैं अपने परिवार के साथ गाॅंव जा रही थी मन में कई विचार आ रहे थे वहाॅं की कच्ची सड़के, सकरी गली और कई ऊँचे नीचे ढलान जो रास्ते में पड़ते थे जिसमें अक्सर ही बैल गाड़ियाँ अटक जाती थी फिर चार-पाॅंच लोगों को बुलाकर बड़ी मुश्किल से  निकाला जाता था। उस समय लोग साइकिल और बैल गाड़ियों से ही सवारी करते थे जिसके कारण कम दूरी भी ज्यादा समय में तय करनी पड़ती थी और कच्चे रास्तों की वजह से यात्रा में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। बारिश के दिनों में सड़कों की हालत इतनी खराब हो जाती थी कि जगह-जगह गड्ढे बन जाते और गड्ढों में पानी जमा हो जाते थे जिसके कारण आने जाने वाले लोगों को कई परेशानियों का सामना करना पड़ता था। उस वक़्त अगर कोई एक बड़ी गाड़ी गाॅंव में आ गई तो उसके पीछे हम बच्चों की झुंड चलती थी, बच्चों के शोरगुल से गाड़ी का चालक परेशान हो जाता था मगर फिर भी बच्चे मानते नहीं थे।

अब गाॅंव का चौपाल आने वाला था जहाॅं लोगों की भीड़ बेवजह ही दिखती थी लहराते हुए हरे-भरे खेत, अपना आम का बगीचा जहाॅं अभी मोजर हुए होंगे। हर घर के दरवाज़े पर मवेशियों की आवाजें और घर का दरवाजा शायद ही किसी का बंद हो। खुले दरवाजे के पास दलान में कोई ना कोई बैठा मिल जाता था हमें कभी दरवाज़ा खटखटाने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी,  हर घर का दरवाज़ा खुला मिलता था। 

इन्हीं सब उधेड़बुन के साथ अपनी सोच से बाहर निकली जब गाड़ी की हॉन् बजी,  हमारी गाड़ी उसी चौपाल पर आ चुकी थी जहाॅं कभी दो-चार दुकानें थी आज कई दुकानें दिखाई दे रहें थे। लगभग शाम हो चुकी थी सभी घर जाने के लिए भाग रहें हो ऐसा प्रतीत हो रहा था। जिसके कारण वहाॅं हमारी गाड़ी उसी भीड़ में कई गाड़ियों की शोर के बीच फँस चुकी थी।

चारो तरफ से गाड़ियाँ निकल रही थी दुकानों से भरा पूरा चौपाल रोशनी में चमक रहा था बड़ी-बड़ी दुकानें और बड़ी- बड़ी गलियाँ देखकर मैं सोचने लगी, कितना रंग रूप बदल गया है इन दस सालों में। शहर के बाजार से जरा भी कम नहीं लगा यह चौपाल, बैल के गले में घंटी डालकर वो बैलगाड़ी का नामो-निशान नहीं दिखा। 

किसी तरह हमारी गाड़ी आगे निकली अब उन गलियों को खोज रही थी मेरी आँखें, मगर अब ना वह कच्ची सड़के थी, ना कच्चे मिट्टी के मकान और झोपड़ियाॅं थी। गाॅंव की काया पलट चुकी थी। चकाचौंध रोशनी के बीच पक्के मकान अच्छे लग रहें थे। हमारी गाड़ियों के पीछे ना कोई बच्चे की झुंड थी, ना किसी का दरवाज़ा खुला मिला। हम जब अपने घर पहुॅंचे तो वहाॅं दादा-दादी ने हमारा आवभगत की। पड़ोस के लोग मिलने आएं, कुछ बचपन की यादें ताजा हो गई।

सुबह होते ही गाॅंव घूमने निकली, खेत खलिहान में सिंचाई के साधन दिखे, वहीं ट्रैक्टर और खेत जुताई के कई साधन भी दिखे, सब कुछ बदल गया था सभी के हाथ में फोन था घर-घर टीवी के अलावा बहुत सारी इलेक्ट्रॉनिक चीजों का इस्तेमाल हो रहा था। गाॅंव अब आधुनिक गाॅंव में तब्दील हो चुका था। आधुनिकता के रंग में रंग चुके थे सभी,  इस बदलाव ने गाॅंव को बहुत कुछ दिया, वहीं हमारी कुछ सभ्यता संस्कृति को ख़त्म भी कर दिया। यह बदलाव मन को अच्छा लगा, मगर कुछ यादें खत्म हो चुकी थी मिट चुकी थी वह कहीं ना कहीं मन के किसी कोने में कचोट भी रही थी।

– Supriya Shaw…✍️🌺

अब तोड़ी हूँ वेग मन का

Dil Ke Alfaz

अब तोड़ी हूँ वेग मन का, मुझको धारा बन बह जाने दो,

मुझे भी साथ ले लो प्रीतम, मुझे भी साथ आने दो।

कदमों के धूल चूम, माथे पर सजाती हर उस क्षण,

विरह की भीषण अग्नि में जब-जब मुझको छोड़ चले जाते हो,

विध्वंस मेरे प्रेम का बचा ले जाते विश्वास कि वह बेला, 

पहले मिलन की याद दिला, साथी बनते जब चाँद सितारे।

अबकी जुड़ी, कई बार टूट कर, अब गले मिल नीर बहाने दो, 

रखो क़दम जहाँ-जहाँ तुम, साथी बन मुझे पीछे आने दो।

कुछ अधूरे से ख़्वाब

बुनती रही, रचती रही, ख़्वाबों में जीती रही, 

कुछ अधूरे से ख़्वाब, अब तक हुए ना पूरे। 

विरह वेदना में घायल मन, आस् का दीपक जलाती रही, 

अश्रु नैनों से बांध तोड़, गालों पर निशान बनाते रहे।

कंपित अधरो से पिया मिलन की, गीत गाते रही, 

अब इंतज़ार को विराम दे दो, दुआ ख़ुदा से करती रही।

अधजगी आँखों से अब तक, ख्वाबों में जीती रही, 

ना उम्मीद का दामन छोड़ी,  हर ख्वाब तेरे नाम करती रही।

सबसे अनोखा रिश्ता – दोस्ती का,

या हो बचपन, चाहे जवानी या बुढ़ापे की हो कहानी,

गर दोस्त ना हो संग जीवन में,

तो हर उम्र ज़िया बिन खुशियों के।

सबसे अनोखा रिश्ता दोस्ती का,

जो पास नहीं, पर साथ है रहता,

अंजाने राहों पर मिला सौगात ये होता,

दुनिया का सबसे अनमोल उपहार बना।

हर बंधन से आज़ाद, ना जाती, धर्म में बंधा रहता, 

जज़्बातों और एहसासो से बना रिश्ता होता, 

टूटने का दर्द भी अनोखा ही होता।

बेमिसाल, स्वच्छंद, आज़ाद 

बस दिलों में क़ैद होना अरमान होता,

जुगलबंदी की ना कोई सीमा,

दोस्तों बिना ज़िंदगी अधूरा।।

– Supriya Shaw…✍️🌺

मेरी अपनी पहचान

मेरी अपनी पहचान

नाम, शोहरत, ज्ञान, व्यवहार से बनती अपनी पहचान है,

मेरी अपनी पहचान ही मेरा स्वाभिमान है।

क़दम-क़दम पर हर चुनौती स्वीकार कर आगे बढ़ी, 

हर चुनौती पर मेरी नई पहचान बनी।

कितनी भी तीव्र प्रहार दे ज़िंदगी हमें, 

आँसूओं को दिखाकर ना हम ख़ुद की पहचान देंगे।

रहेंगे अडिग अपने मक़सद पर, कमज़ोर ना ख़ुद को दिखलाएंगे,

ज़िंदगी के हर परीक्षा में हँसते हुए आगे बढ़ेंगे।

अपने लक्ष्य को ख़ुद पाना है

जीवन के संघर्ष का जंग चलता रहेगा,

जीत का जश्न, तो हार का दंश भी सहना पड़ेगा।

तपिश तेज हो मगर सागर कभी सूखता नहीं, 

जिगर में आग हो तो लक्ष्य पाना मुश्किल नहीं।

मुसीबत आएगी डरा कर चली जाएगी, 

धैर्य और साहस से, मौसम का मिजाज़ बदल जाएगा। 

बढ़ा आत्मबल, बनकर सबल, आँधियों को चीर तु चलता चल, 

लगन बढ़ा, चल निडर अपने लक्ष्य को ख़ुद पाना है।

केवल अपने स्वार्थ की नहीं दूसरों के हित की भी सोचो

केवल अपने स्वार्थ की नहीं दूसरों के हित की भी सोचो,

जज़्बात सीने में गर है तो ख्याल दूसरों का भी रखो,

क्या पता कल समय साथ दे ना दे, आज को संभाल कर रखो,

हर घड़ी हक़ में नहीं होती, ज़िंदगी के कुछ पल उधार भी रखो।।

जब सभी रास्ते बंद हो जायें तब ख़ुद अपनी राह बनाओं

जब सभी रास्ते बंद हो जायें, 

तब ख़ुद से अपनी राह बनाओं, 

मंज़िल का पता ना मिल पायें, 

ख़ुद से कई सवाल करो। 

हर सवाल एक रास्ता बन जायेगा, 

मंज़िल भी बहुत पास नज़र आयेगी, 

एक वक़्त वह भी आयेगा, 

जब हर कोई तुमसे रास्तों का पता माॅंगेगा।।

– Supriya Shaw…✍️🌺